क ख ग से शुरू किया था अब डिग्री पढ़ा कहलाता है
खिलखिला कर हसने वाला अब मायूशी में रेहता है
बचपन में खूब खाया अब निर्धारित भोजन पाता है
सब से बात करने वाला अब सर्कल तक ही सीमित है
कभी ना थकने वाले की अब साँस फूलने लगती है
हूँ तो मैं वही आज भी बस समय बीत जाता है।
सब खुल कर कहने वाला अब बात सोच कर करता है
प्रेम सब से करने वाला अब संदेह सब पर करता है
कपड़े का तब होश नहीं अब नित नया वस्त्र सजाता है
भरपूर सोने वाले की अब मोबाइल में रात बीतती है
रोता तो आज भी है अब बस आँसु नहीं बहाता है
हूँ तो मैं वही आज भी बस समय बीत जाता है
खिलोने तक बाँटने वाला अब अपना ही घर भरता है
सब को अपना मानने वाला अब अपनो से हि डरता है
सब की ख़ुशी चाहने वाला अब नाखुश सा ही रेहता है
असंखय ख़्वाब देखने वाला अब तक़दीर की बात करता है
बेपरवाह जीने वाला अब ऊमीदों के सहारे है
हूँ तो मैं वही आज भी बस समय बीत जाता है
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