काँटे चुभने पर जब रोया तब फुलों को देख मुस्कुराना सीखा
तपती धूप में जब पसीना बहा तब वृक्षों को लगाना सीखा
जब अपनो से दूर रहा तब अपनो को अपनाना सीखा
मैंने तो बस ठोकर खाकर ही चलना सीखा।
भूख लगने पर ही किसान का आदर करना जाना
ग़रीबी को देख ही परमात्मा का शुक्रिया करना जाना
समय बीत जाने पर ही तो समय की ऐहिमीयत जान पाया
बस तभी तो मैं ठोकर खाकर ही चल पाया
देर तक अकेला चलने पर ही तो राहगीरों से बात करना सीखा
गिरने पर जब मुझे अनजानो ने उठाया तब दूसरों की मदद करना सीखा
बार बार गिर कर जब उठा तब गिरने को भी सहराना सीखा
मैंने तो बस ठोकर खाकर ही चलना सीखा
अनाथों को देख ही तो माँ बाप को पूज पाया
जब सूखे के बाद बारिश ने हरियाली दी तभी मैं पानी में जीवन देख पाया
बार बार जब हाथों के बल जब ज़मीन पर गिरा तभ फिर हाथ झाड़ मैं आगे बढ़ पाया
मैं तो बस ठोकर खाकर ही चल पाया।
गुलजीत।