Sunday, October 25, 2020

बस समय बीत जाता है।

   से शुरू किया था अब डिग्री पढ़ा कहलाता है

खिलखिला कर हसने वाला अब मायूशी में रेहता है

बचपन में खूब खाया अब निर्धारित भोजन पाता है

सब से बात करने वाला अब सर्कल तक ही सीमित है

कभी ना थकने वाले की अब साँस फूलने लगती है

हूँ तो मैं वही आज भी बस समय बीत जाता है।


सब खुल कर कहने वाला अब बात सोच कर करता है

प्रेम सब से करने वाला अब संदेह सब पर करता है

कपड़े का तब होश नहीं अब नित नया वस्त्र सजाता है

भरपूर सोने वाले की अब मोबाइल में रात बीतती है

रोता तो आज भी है अब बस आँसु नहीं बहाता है

हूँ तो मैं वही आज भी बस समय बीत जाता है


खिलोने तक बाँटने वाला अब अपना ही घर भरता है

सब को अपना मानने वाला अब अपनो से हि डरता है

सब की ख़ुशी चाहने वाला अब नाखुश सा ही रेहता है

असंखय ख़्वाब देखने वाला अब तक़दीर की बात करता है

बेपरवाह जीने वाला अब ऊमीदों के सहारे है

हूँ तो मैं वही आज भी बस समय बीत जाता है

Monday, October 5, 2020

व्यर्थ प्रेम की तलाश।


सागर किनारे बैठ कर अगर ओस से प्यास बुझाता हूँ

फूलों के बगीचे में बस गुलदस्ता ही सजाता हूँ

मधुर हर ध्वनि में सिर्फ़ प्रशंशा सुनना चाहता हूँ

खूबसूरत सब सृष्टि में अगर चंद चेहरों पर आकर्षित हूँ

तभ व्यर्थ मेरी प्रेम की तलाश मैं खुद को वंचित पाता हूँ।


सर्व हित छोड़ कर बस स्वार्थ से मैं हर्षित हूँ

कुपोषित की उपेक्षा कर बस अपना थाल सजाता हूँ

फटा कपड़ा पहने को देख भी सादा वस्त्र हटाता हूँ

और पैदल चलने वालों पर अगर हार्न बजाता जाता हूँ

तभ व्यर्थ मेरी प्रेम की तलाश मैं खुद को वंचित पाता हूँ।


लावारिस गायों को देख भी मैं कुत्ते को सहलाता हूँ

वृक्ष असंख्य काट कर बस गमला ही लगाता हूँ

मानव देव नहीं मैं पथर को शीष नवाता हूँ

जीव मांस खाकर भी मानव मैं कहलाता हूँ

तभ व्यर्थ मेरी प्रेम की तलाश मैं खुद को वंचित पाता हूँ।


गुलजीत

Saturday, August 29, 2020

मैंने तो बस ठोकर खाकर ही चलना सीखा।

काँटे चुभने पर जब रोया तब फुलों को देख मुस्कुराना सीखा

तपती धूप में जब पसीना बहा तब वृक्षों को लगाना सीखा

जब अपनो से दूर रहा तब अपनो को अपनाना सीखा

मैंने तो बस ठोकर खाकर ही चलना सीखा।


भूख लगने पर ही किसान का आदर करना जाना

ग़रीबी को देख ही परमात्मा का शुक्रिया करना जाना

समय बीत जाने पर ही तो समय की ऐहिमीयत जान पाया

बस तभी तो मैं ठोकर खाकर ही चल पाया


देर तक अकेला चलने पर ही तो राहगीरों से बात करना सीखा

गिरने पर जब मुझे अनजानो ने उठाया तब दूसरों की मदद करना सीखा

बार बार गिर कर जब उठा तब गिरने को भी सहराना सीखा

मैंने तो बस ठोकर खाकर ही चलना सीखा


अनाथों को देख ही तो माँ बाप को पूज पाया

जब सूखे के बाद बारिश ने हरियाली दी तभी मैं पानी में जीवन देख पाया

बार बार जब हाथों के बल जब ज़मीन पर गिरा तभ फिर हाथ झाड़ मैं आगे बढ़ पाया

मैं तो बस ठोकर खाकर ही चल पाया


गुलजीत।


Saturday, January 11, 2020

Life will be happier if you rejoice the world around you. Be it whatever.
The best part you can do to anyone’s present is to motivate them and spread love and happiness. Consequently you will be happier.