सागर किनारे बैठ कर अगर ओस से प्यास बुझाता हूँ
फूलों के बगीचे में बस गुलदस्ता ही सजाता हूँ
मधुर हर ध्वनि में सिर्फ़ प्रशंशा सुनना चाहता हूँ
खूबसूरत सब सृष्टि में अगर चंद चेहरों पर आकर्षित हूँ
तभ व्यर्थ मेरी प्रेम की तलाश मैं खुद को वंचित पाता हूँ।
सर्व हित छोड़ कर बस स्वार्थ से मैं हर्षित हूँ
कुपोषित की उपेक्षा कर बस अपना थाल सजाता हूँ
फटा कपड़ा पहने को देख भी सादा वस्त्र हटाता हूँ
और पैदल चलने वालों पर अगर हार्न बजाता जाता हूँ
तभ व्यर्थ मेरी प्रेम की तलाश मैं खुद को वंचित पाता हूँ।
लावारिस गायों को देख भी मैं कुत्ते को सहलाता हूँ
वृक्ष असंख्य काट कर बस गमला ही लगाता हूँ
मानव देव नहीं मैं पथर को शीष नवाता हूँ
जीव मांस खाकर भी मानव मैं कहलाता हूँ
तभ व्यर्थ मेरी प्रेम की तलाश मैं खुद को वंचित पाता हूँ।
गुलजीत
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